Zindagi

Zindagi ab to amanat hai teri..

Har khushi, dhundhu main tujhse judi…
Har kadam …santh main chalna tere…..
Dekhu tujhe, ankhe jb meri khule…..
Har tarang … tujhse hi judte dikhe…..
Sanso main bhi teri hi khushbu miley…..
Dhadkan meri …mujhse shararat kare…..
Sanse meri tere hi dum se chale ……
Zindagi meri h tu …..
Har khushi tujhse meri….
Zindagi ab to amanat h teri …………….

* * * * * *

POET- Kalpana Patel

Asksar kyo…….?

Asksar kyo…….?

Apne hi bhrosha tod jate hai….
Labo pe gile sikve chod jate hai…..
Jin par ho sabse jyada viswas…..
Jo h hamare liye sabse khas…
Wo hi hamse muh mod jaye hai……

Akhasr kyo………?

Dil main dard to hota hai…..
Par banya nhi kar pate…….
Ankhon main nami to hoti hai…..
Par anshu baha nhi pate……
Or chah kr bhi na jane kyon….
Ham anshu chupa nhi pate…….

Akhasar kyo………?

Kisi ko chah kr bhi bhula nhi pate……..
Dil ka dard sabko bayan krna to chahte hai….
Pr labj byan nhi kr pate……
Waqt kam hote h gila krne ko ……
Shbad kam hote h shikwa krne ko ……
Par shikayte hai ki dil se mita nhi pate……

Akhsar kyo……..?

POET- Kalpana Patel

Google Celebrates 340th Anniversary Of The Determination Of Speed Of Light With An Awesome Doodle

What is the speed of light?

The answer to this question was discovered 340 years ago by one of the great astronomers, on December 7, 1676. Google marked the 340th anniversary of the great discovery with fascinating Google Doodle today.

The speed of light was discovered by a Danish astronomer called Ole Romer. Before Romer, the famous astronomer, physicist and mathematician Galileo Galilei also tried to measure the speed of light. While the Galileo failed to determine the speed of light, Ole Romer succeeded.

To celebrate the discovery of the speed of light by Ole Romer, Google came up with an animated Google Doodle which depicts what led the astronomer to the historic discovery.

Today’s Google doodle shows how the study and the discovery came into being.

Roemer began his research decades later in 1673 when he noticed the time elapse between the eclipses of a Jupiter moon called Io, which Galileo had discovered in 1610.

By monitoring the time difference, Roemer estimated light seems to take about 10 to 11 minutes to cross a distance equal to the half-diameter of the Earth’s orbit around the Sun. This means that light travels at about 200,000,000 meters per second, which is around 26 % below the established speed.

The Royal Observatory in Paris, for whom Romer was doing research works, wasn’t convinced with his conclusions. When other philosophers of the period, such as Christiaan Huygens and Isaac Newton backed the theory, it started gaining support.

It was finally confirmed nearly two decades after Romer’s death when English astronomer James Bradley in 1728 discovered the “aberration” of starlight and a speed of 295,000,000 meters per second for light

एक चिट्ठी बेटी के नाम

झूठी कसम नहीं खानी चाहिए, और अगर खानी भी पड़े तो सबसे सेफ भगवान की कसम होती है ! हिंदी में बहुत से राइटर हुए, कुछ ने नाम कमाया तो कुछ बस नाम के राइटर रह गए, इसी बीच नाम आता है दिव्य प्रकाश दुबे जी का जिन्होंने “टर्म्स एंड कंडीशन्स अप्लाई” और “मसाला चाय” नाम से २ किताब लिखी है, साथ ही इनके फेसबुक पोस्ट्स में खास तरीके के खत दिख जायेंगे, वो खत जो एक बाप / बेटा / पति / प्रेमी कि दिल की अनकही बात होती है जो वो इसलिए लिख के रखते है कि क्या पता किसी को भेजने की जरूरत पड़ जाये। पेश है इस लेखक का एक पत्र !

प्रिय बेटी,

तुम्हें चिट्ठी लिखते हुए एक अजीब सी घबराहट हो रही है। लग रहा है तुमसे पहली बार कोई बात करने जा रहा हूँ। नहीं नहीं इसलिए नहीं कि मेरे पास लिखने के लिए बातें नहीं है । बल्कि इसलिए कि इतनी बातें हैं कि समझ नहीं आ रहा कि आखिर शुरू कहाँ से करूँ। सबकुछ माँ पर छोड़कर हम शायद भूल ही गए हैं कि एक बाप और बेटी सीधे भी बात कर सकते हैं।

वो कहते हैं न कि बाप के जूते जब बेटे के पैर में आने लगे तो रिश्ता बाप-बेटे का नहीं रहता दोस्त का हो जाता है। पता नहीं ऐसा कुछ कभी किसी ने बेटी के लिए क्यूँ नहीं कहा। शायद इसलिए क्यूंकी लड़कों को तो जूते के साइज़ बराबर बड़ा होने में सालों लग जाते हैं। लेकिन लड़कियां उसी दिन से पापा की दोस्त हो जाती हैं जिस दिन वो अपनी तुतलाती आवाज़ में पहली बार मम्मी की सब शिकायतें करती हैं।

जब तुम पहली बार हॉस्टल जा रही थी और तुम्हारी माँ बार बार तुमको बोल रही थी कि बेटी घर की इज्ज़त तुम्हारे हाथ में है कोई ऐसी वैसी बात मत करना, पढ़ने जा रही हो बस मन लगाकर पढ़ना। पता नहीं तुमने माँ की कितनी बात मानी।  मान ली तो अच्छा आखिरी बात माँ ने कही थी नहीं भी मानी तो और भी अच्छा क्यूंकी लड़की के बॉयफ्रेंड और घर की इज्ज़त के बीच न कोई रिश्ता कभी हुआ करता था न होता है और न ही होगा।

सही से पढ़ाई करना, खाना टाइम से खा लेना, ऑफिस में मन लगाकर काम करना ये सब बातें इतनी बोरिंग हैं कि बोलने का मन नहीं करता। मुझे मालूम है ये सब तुम अपने आप manage कर लोगी। बेटी कुछ भी करना लाइफ में, बनाना चाहे बिगाड़ना शादी करना या नहीं करना फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन याद रखना मैं कभी अखबार में, मैट्रीमोनी वेबसाइट में तुम्हारी शादी का ऍड नहीं देने वाला। सारी पढ़ाई लिखाई और समझदारी सीखने के बाद भी अगर शादी के लिए तुम हमपर dependent हो तो समझो सब सीखना बेकार ही हो गया।

बस कभी अपनी माँ जैसी मत बनना, अगर कभी बनना ही पड़े तो अपनी बेटी जैसी बनना। क्यूंकी बेटी आने वाला कल की माँ होती है और माँ बीते हुए कल की बेटी। उम्मीद है कि आगे भी चिट्ठी लिखता रहूँगा। जब बात शुरू हो ही गयी है तो रुकनी नहीं चाहिए।

पापा

~ हरिशंकर देवांगन की दुनियादारी